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रोटी - कितनी खोटी? Download pdf
हम रात-दिन मेहनत करते हैं, दो रोटी के लिये। वह रोटी हमें केवल जीवित रख रही है या हमें स्वास्थ्य दे रही है? जिस रोटी के लिये हम रात-दिन भाग-दौड़ करते हैं, तनाव लेते हैं, लोग तो अपने ईमान और चरित्रा तक भ्रष्ट कर लेते हैं, वह रोटी कहीं हमें रोगी तो नहीं बना रही है?आइये, जानें रोटी कितनी खोटी?
फुलका रोटी - भारत के अध्कितर घरों में फुलका रोटी खाई जाती है। यह रोटी २ मिनट के भीतर पककर फूल जाती है परंतु यह २ मिनट वाली रोटी में स्टार्च;कार्बोहाईड्रेटद्ध का शर्करा में पूरा रूपांतरण नहीं होता। यह करीब ५० के आस-पास पकता है इसका बाकी स्टार्च अध्पका रह जाता है। इसलिये जब हम रोटी को चबाते हैं तो मुँह में ऐसा लगता है जैसे गीला आटा चबा रहे हैं जो थोडा सिंक गया है। रोटी में अगर कुछ पूरी तरह पकता है तो वह रोटी का पतला हिस्सा जो ऊपर पपडी की तरह होता है इसलिये ऊपर की पपडी निचली परत से ज्यादा स्वादिष्ट एवं मीठी लगती है।|

यही अध्पके स्टार्च वाली यह रोटी जब हम चबाकर खाते हैं तो पूरी तरह सिंकी करारी रोटी के मुकाबले यह कम मीठी लगती है। यह अध्पका स्टार्च जब आँतों से गुज़रता है तो सड कर निकलता है। इसी कारण शौच ;मलद्ध में बदबू होती है ;एक हल्की खट्‌टी-सी दुर्गंध्द्ध जिसे हम सामान्य अवस्था मानते हैं क्योंकि सबका मल बदबूदार होता है लेकिन सच्चाई उल्टी है, जब अच्छी तरह पका हुआ स्टार्च पेट से निकलता है तो उसमें खट्‌टी सड न की दुर्गंध् न होकर मिट्‌टी जैसी हल्की दुर्गंध् होती है। |

यही अध्पके स्टार्च सड़कर जब आँतों से गुज रता है तो इसका सड नयुक्त एसिड हमारे पाखाने के पत्थर को भी प्रभावित करता है। इसी कारण, हमें उसे समय-समय पर फिनाईल और एसिड से धेना पड ता है। सच्चाई तो यह है कि पाचनतंत्रा के नियमानुसार आँतों से केवल बीज और छिलका ही निकलना चाहिये अध्पचा आहार नहीं क्योंकि भोजन का पूरा अवशोषण होने के बाद सिर्फ बीज और छिलका ही बच जाते हैं। अध्पचा भोजन निकलने का शरीर का कोई नियम ही नहीं है। अगर मल में ऐसा भोजन निकल रहा है तो या तो आप ग लत खाना खा रहे हैं या आपका पाचन तंत्रा खराब है। विश्व में सभी का लगभग मल ऐसा ही दुर्गंध्वाला निकलता है।|

फुलका रोटी अध्पचा स्टार्च वाला भोजन है जिसे पचाने में शरीर को बहुत देर लगती है इसलिये जब हम दोपहर को २-३ रोटी खा लेते हैं तो हमें अगले ९-१० घंटे भूख नहीं लगती क्योंकि इस रोटी को पचने में बहुत समय लगता है। इस रोटी को पचकर निकलने में १८ घंटे से ज्यादा लग जाते हैं जो बहुत लंबा समय है परंतु हम इसे सामान्य मानते हैं।
दलिया शीघ्र पचता है - दलिया यानि गेहूँ का आध टुकड़ा जब लगभग आध घंटा पानी में उबलकर धीरे - धीरे पकता है तब जाकर कहीं, उसका पूरा स्टार्च शर्करा में परिवर्तित होता है। इसलिये दलिया का पाचन रोटी के मुकाबले आध्े समय में हो जाता है। कहाँ आधे घंटे में पकने वाला दलिया और कहां दो मिनट में पक जाने वाली रोटी! आप स्वयं निर्णय करें। पूरी सिंकी हुई रोटी बेहतर है - रोटी का पूरा फायदा उठाना है तो रोटी को अच्छी तरह बिस्किट की तरह ध्ीमी आँच पर सेंकिये, जब वह भूरे रंग की मिट्‌टी जैसी खुशबू देने लगे तब समझना चाहिये कि रोटी का स्टार्च पूरी तरह पक गया है। ऐसी रोटी दलिये से भी शीघ्र पचती है।|

कच्ची ब्रेड नहीं , टोस्ट बेहतर है-हम सब इस बात को अच्छी तरह अनुभव से जानते हैं कि कच्ची ब्रेड अच्छी तरह सिंका हुआ टोस्ट हमें पेट में हल्का लगता है। हम ऐसे ४-६ टोस्ट भी खा लें तो हमें पेट में भारी नहीं लगते और शीघ्र पच भी जाते हैं लेकिन जब हम कच्ची ब्रेड खाते हें तो पेट काफी देर तक भारी रहता है और जल्दी भूख नहीं लगती जबकि टोस्ट खाने के बाद शीघ्र भूख लगने की संभावना होती है। कच्ची ब्रेड अध्पका स्टार्च होने के कारण पेट में काफी देर तक रहकर सड़ता है और कब्ज, गैस जैसी बीमारियाँ पैदा करता है, जबकि पूरा सिंका हुआ टोस्ट ऐसी समस्या नहीं पैदा करता। कच्ची ब्रेड के साथ अगर मक्खन है तो वह और भारी होकर पचने में अध्कि देर लगाएगा और अगर उस पर फलों का जाम, शहद या चीनी लगी है तो उसके सड ने की पूरी गारंटी है क्योंकि पाचन के नियमानुसार फलों की शर्करा अन्न के स्टार्च के साथ सड ती है, पचती नहीं। अगर आपने इसके साथ चीज  या पनीर जोड  दिया है तब तो आपने अपच, सड न, एसीडिटी और गैस की आपने पूरी व्यवस्था कर ली। मेरी बातों पर यकीन नहीं करें आप स्वयं खायें, अनुभव करें और विश्वास करें। ब्रेड और दूध्, ब्रेड और अंडे भी पेट में ग लत मेल के कारण भयंकर रूप से सड ते हैं।|

खाखरा - राजस्थान और गुजरात में पतली रोटी को अच्छी तरह सेंककर पापड़ की तरह करारा बनाया जाता है जिसे खाखरा कहते हैं। यह पूरा सिंक जाने के कारण बहुत हल्का और सुपाच्य होता है परंतु यह अगर घर में चोकर समेत आटे से बनाये जायें तो ही बेहतर है। बाजार में मिलने वाला खाखरा मैदे की तरह बारीक आटे से बनाया जाता है जिससे उसमें खुज्जा ;रेशेद्ध या फाइबर नहीं के बराबर होते हैं। ऐसे खाखरे शीघ्र पच तो जाते हैं परंतु उसमें पोषण तत्व नहीं के बराबर होते हैं। आजकल रोटी बनाने वाली बिजली मशीन से ऐसे खाखरे घर में बनाये जा सकते हैं। ये बिस्कुट के सर्वश्रेष्ठ विकल्प हैं।|

बिस्कुट तला हुआ आहार है - सभी महिलायें अच्छी तरह जानती है कि बिस्कुट बनाने के लिये हमें १ किलो मैदे के साथ करीब आध किलो डालडा या घी मिलाना पड़ता है और उतनी ही चीनी भी। फिर हम इसे आधे  घंटे तक सेंकते हैं। कचौडी, समोसा बाहर से तलते हैं। बिस्कुट भीतर से तलते हैं इसलिये ये तली हुई मैदे की मठ्‌ठी की तरह स्वादिष्ट लगता है। निश्चय ही धीरे धीरे सिंकने से इसमें स्टार्च का शर्करा के रूप में रूपांतरण पूरा होता है परंतु डालडा, घी के कारण यह भीतर से तल जाता है जिससे यह पेट में बहुत देर से पचता है और चीनी साथ में होने के कारण यह शीघ्र सड  भी जाता है। बिस्कुट पेट से हमेशा सड कर ही निकलता है इसी कारण  बड़ों और बच्चों के पेट में कीडे पैदा होते हैं। हमारे दोनों बच्चों के पेट में कभी कीडे नहीं पडे क्योंकि बचपन से ही उन्होंने हमारे घर में बिस्कुट के कभी दर्शन नहीं किये और आज भी वह इसे खाना पसंद नहीं करते। चाय के साथ खाखरा खायें, बिस्कुट नहीं।|

राजस्थान की मोटी रोटी :- राजस्थान की मोटी रोटी थोड़े घी का मोन डालकर करीब-करीब २० से ३० मिनट तक धीमी आँच परसिगडी पर सेंकी जाती है। यह रोटी २ मिनट वाली रोटी से बेहतर है। परंतु इसका प्रचलन भारत के अन्य प्रांतों में नहीं है।|

पराँठा पूरी से भारी होता है - पराँठा मोटी रोटी की तरह होती है जिसमें अगर घी का मोन ज्यादा है तो यह खतरनाक है, कम है तो ठीक है। इसे रोटी की तरह जल्दी सेंक लेते हैं। पराँठे पर घी या तेल डालते ही स्टार्च घी या तेल की गर्मी से शीघ्र सिंकने लगता है परंतु इस सिंकाई में घी-तेल सीधे तवे पर जल जाने के कारण अत्यंत हानिकारक हो जाते हैं इसलिये घर में जब परांठे बनते हैं तो पूरा घर धुँएं  से भर जाता है और किचन जल्दी काला हो जाता है। यही हाल आपके पेट का भी होता है। ऐसा तला हुआ तेल और घी, शरीर को बहुत नुकसान पहुँचाता है। पराँठे भी शीघ्र सिंकने के कारण अध् पका स्टार्च होता है।|

कैसे बनायें और खायें पराँठा - पराँठा बिना घी-तेल के सूखे तवे पर धीमी  आँच पर अच्छी तरह सेंक लें। जब वह बिस्कुट के भूरे रंग की तरह हो जाए तो उसे नीचे लेकर उस पर घर का सफेद मक्खन लगाएँ या घी लगाएँ। ऊपर से लगाया हुआ घी, मक्खन नुकसान नहीं करता, पाचन में थोड़ी देर जरूर लगायेगा, पानी के बजाय सब्जियों से गूँथे हुए आटा पराँठे को और हल्का कर देता है। पूरी पराँठे से बेहतर - पराँठे में घी-तेल जल जाता है परंतु पूरी में ऐसा नहीं होता। पूरी एकदम खौलते हुये तेल-घी में बहुत शीघ्र सिंककर फूल जाती है। यह भी रोटी की तरह अध्पकी होती है परंतु इसकी सिंकाई रोटी से थोडी ज्यादा होने के कारण जब यह करारी बन जाती है तो रोटी के मुकाबले मीठी लगती है परंतु घी-तेल के साथ जुड  जाने के कारण यह रोटी के मुकाबले दुगुने समय में पचती है परंतु यह पराँठे से बेहतर है क्योंकि इसमें घी-तेल सीध्े नहीं जलता। अगर आप हलवाई या होटल की पूरी खा रहे हैं तो यह खतरनाक हो सकती है क्योंकि हलवाई जो कढाई में एक बार तेल-घी डालता है वही तेल घी घंटो जलने पर महाघातक विष बन जाता है जिसे कारसीनोजेनिक ;कैंसर पैदा करने वालाद्ध तेल कहा जाता है। यह तेल-घी उबलकर कभी खायें अगर पूरी बनानी ही है तो पूरी बनाने के बाद वह उबलता हुआ तेल-घी दोबारा भूलकर भी उपयोग करें। उसे फेंक दें। वह उबलकर जहरीला हो जाता है। पूरी और पराँठे आज नहीं तो कल आपको रसौली ;गांठे, ट्‌यूमरद्ध, फाइबा्रेइड, गॉल ब्लाडर की पथरी, हार्ट ब्लॉकेज, सिस्ट, कैंसर, गंजापन जैसी बिमारियों में जरूर ले जायेगा। इसलिये ऐसी चीजें शौकिया तौर पर कभी कभार ही खायें।|

राजस्थानी बाटी - इसमें आटे का गोला बनाकर धीमी आँच पर सेंका जाता है। इसमें ऊपरी खोल तो अच्छी तरह सिंक जाता है परंतु अंदर का आटा अध्पका ही रहता है। उसका शर्करा में पूरा रूपांतरण नहीं होता इसलिये यह भी रोटी की तरह देर से पचता है। घी डालने पर पाचन में दुगुनी देरी हो जाती है।
तंदूरी;पंजाबीद्ध रोटी या रबड़ की रोटी - पंजाबी/तंदूरी रोटी विश्वभर में प्रचलित है। यह रोटी हाथ से थप-थपाकर गोल बनाई जाती है और गर्म तंदूर में चिपका दी जाती है। तंदूर की गर्मी से रोटी धीरे -धीरे  उसी तरह सिंकती है जैसे तवे की रोटी। अंतर सिर्फ इतना है कि इस रोटी में मेहनत कम है और जल्दी बन जाती है। इस रोटी का स्टार्च भी अध्पका रहता है। इसका प्रमाण यह है कि १५-२० मिनट के बाद ही जब यह रोटी ठंडी हो जाती है तो रबड  की तरह सखत हो जाती है और फिर इस रोटी को खींचकर तोड़ना पड ता है और चबाने के लिये दांतों को काफी लंबे समय तक काम करना पडता है, उसके बावजूद यह रोटी मुँह में पूरी तरह नहीं टूटती ;और इतना धीर्ये किसी के पास नहीं है कि इसको आराम से बारीक होने तक चबाता रहेद्ध और हमें मज बूरन सब्जी के सहारे इसे निगल लेना पडता है। यह रोटी सामान्यतः तवे वाले फुलके से अध्कि हानिकारक क्योंकि होती है जिस रोटी को दाँत नहीं तोड  सकते, उसे आँत क्या तोड़ेगी , जो ठंडी होते ही ऐसे रबड  की तरह बन जाती है कि उसे हाथ से खींचकर तोड ना पड ता है! क्या वह रोटी खाने योग्य है? चोकर वाले आटे की रोटी शायद इतनी परेशान न करे परंतु मैदे वाली रोटी तो पूरी तरह रबड  बन जाती है और अध्कितर होटलों में ऐसी ही रोटी मिलती है। |

ऐसी रबड़ वाली रोटी न तो चबाई जा सकती है और न ही पचाई जा सकती है। मुझे आज तक समझ में नहीं आया कि लोग ऐसी घटिया रोटी खाना क्यों पसंद करते हैं? शादी-ब्याह में ऐसी रोटी खाने के बजाय चावल खाना ज्यादा बेहतर है। जो रोटी गर्म खाने लायक हो और ठंडी होने पर न खाई जा सके वह रोटी बेकार है, इससे बचें। तंदूरी रोटी खानी ही है तो मोटे चोकर वाले आटे से बनी रोटी ही खाएँ, क्योंकि यह रोटी भी हालाँकि थोड ी देर बाद रबड की तरह सखत हो जाती है परंतु मैदे की रोटी से कम नुकसान करती है। मैदे की रोटी तो पेट के लिये सर्वाध्कि हानिकारक है। नान और कुलचे का भी यही हाल है।|
कौन-सी रोटी जल्दी पचती है - जो रोटी धीमे आँच पर बिस्कुट की तरह भूरे रंग में पककर करारी होती है, जो रोटी पानी में उबलकर पूरी तरह पक जाती है। ;गुजरात और राजस्थान में रोटी को दाल में उबाला जाता है जिसे दाल ढोकली कहते हैंद्ध, वही जल्दी पचती है। पानी में दलिये की तरह अच्छी तरह उबलने के कारण इसके स्टार्च का पूरा रूपांतरण होता है जिससे यह रोटी सामान्य तवे या तंदूर वाली रोटी से बहुत जल्दी पच जाती है।
राजस्थान में बची हुई ठंडी रोटियाँ मसालेदार पानी में छोंककर फिर उबालकर खायी जाती हैं। यह रोटी भी बहुत जल्दी पच जाती है। अनाज का या रोटी का मूल सिद्धांत यही है कि रोटी की पूरी तरह सिंकाई होनी चाहिये चाहे सेंककर या उबालकर।
रोटी के पूर्ण पाचन के लिये आहार के मेल का पूरा खयाल रखें।
रोटी के साथ ले सकते हैं - सलाद, हरी सब्जियाँ, दालें, पतली छाछ, अंकुरित दालें
रोटी के साथ कभी न लें - दूध् की चीजें, माँसाहार, मेवे, फल, चीनी, खटाई, जूस
आशा है इस तरह आप रोटी का ;अपनी गाढ़ी कमाई काद्ध सचमुच पूरा लाभ उठा पायेंगे।
• अन्न हरी अवस्था में बहुत शीघ्र पचता है। • ८ घंटे भीगे हुए साबुत अन्न और दालें शीघ्र पचते हैं। • अंकुरित दलिया सामान्य दलिये से आधे समय में पचता है। • अंकुरित गेहूँ के आटे की रोटी सामान्य रोटी से शीघ्र पचती है। • दलिया रोटी से जल्दी पचता है। • बिस्कुट की तरह सिंकी हुई रोटी सामान्य रोटी से जल्दी पचती है। • पानी में उबली हुई रोटी सामान्य रोटी से शीघ्र पचती है। • सामान्य रोटी देर से पचती है। • पराँठा पचने में रोटी से ज्यादा समय लेता है। • पूरी भी पराँठें की तरह देर से पचती है। • चने और सोयाबीन आटे की बनी रोटी सामान्य रोटी से पचने में ज्यादा देर लगाती है। • मिस्सी रोटी भी सामान्य रोटी के मुकाबले देर से पचती है। • बाजरा, ज्वार, मकई एवं चावल की रोटी तवे पर ज्यादा देर तक सिंकने के कारण सामान्य रोटी से जल्दी पचती है।
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