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| कुंडलिनी जागरण - एक खतरनाक धोखा |
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मानव के अंदर अनेकों प्रकार की सुषुप्त शक्तियों का भंडार है। उनमें कुंडलिनी जागरण का नाम सबसे ऊपर है। मुझे कुंडलिनी जागरण के बारे में सैकड़ों सवाल विद्यार्थियों ने पूछे हैं और उनके जवाब मैं निरंतर देते आया हूँ उनमें से ही कुछ अंश यहां प्रस्तुत कर रहा हूँ। मैं १४ साल से सूक्ष्म ऊर्जाओं एवं परामानसिक विज्ञान पर अध्ययन, रिसर्च एवं कार्यशालायें आयोजित करता रहा हूँ। कुंडलिनी जागरण जैसे शब्दों से मैं भी आम आदमी की तरह बहुत प्रभावित था, लेकिन जैसे-जैसे मैं इसकी गहराई में जाता रहा मुझे सदियों से चली आ रही मूर्खतायें एवं इस शब्द पर पड़े भ्रम पर दया और हंसी ही आई। आइये इसकी सच्चाई को समझें। कुंडलिनी का अर्थ है - कुंडल मार कर बैठी हुई कुंड (यानि कटोरा, एक खोखला स्थान) जिसमें एक प्रबल ऊर्जा कास्रोत। जिसे सर्प की संज्ञा दी गई। क्योंकि वह सांप की तरह लहराती हुई, फूंफकारती हुई, ऊपर उठती हुई महसूस होती है। यहाँ उर्जा ठीक हमारे नाभी केन्द्र के नीचे, हमारी रीढ़ की हड्डी के अंत में काम (सेक्स) केन्द्र के पास होती है। ईश्वर का हर कार्य नियम बद्ध है। काम सारे संसार के उत्पत्ति, प्रजनन एवं प्रगति की हर प्राणी को मिली हुई एक महाशक्ति है। इतना बड ा ऊर्जा का भंडार नाभी केन्द्र के पास होने की वजह निश्चित ही इस केन्द्र को शक्ति प्रदान करना है। कुंडलिनी मूल रूप से काम ऊर्जा है। इसलिये काम ऊर्जा को प्रबल रूप से जाग्रत कर इसे सेक्स में खर्च न कर ऊर्जा को अर्ध्वगमन कर अलौकिक शक्तियां और आध्यात्मिक अनुभवों के लिये प्रयोग की जाती है। परंतु सदियों से चले आ रहे कुछ तथ्य जो अब तक अनुभव में आते रहे हैं वह इस प्रकार हैं -
- कुंडलिनी जागरण का अध्यात्मिकता से, आत्मदर्शन से, जागरण से, या परमात्मा के दर्शन से कोई लेन-देन नहीं। यह मात्र एक शरीर की प्रबल ऊर्जा का भंडार है जो शरीर में नीहित शारीरिक, मानसिक एवं साईकिक (परामानसिक) शक्तियों के लिये उपयोग की जा सकती है।
- कोई भी उपरोक्त शक्तियों का जागरण केवल अहंकार को पुष्ट करता है। शक्ति की कामना ही अहंकार की कामना है। क्योंकि हम कुछ विशेष, दूसरों से अधिक शक्तिशाली बनने के लिये, गुलाम बनाने के लिये, दूसरों को निष्कृष्ट साबित करने के लिये, या अहंकार को संतुष्ट करने के लिये शक्ति की कामनाकरते हैं। अहंकार की कामना और उसकी पुष्टि आध्यात्मिक होने की सबसे बड़ी बाधा है। इसलिये कुंडलिनी जागरण की इच्छा भी आध्यात्मिकता के दरवाजे हमेशा के लिये बंद कर देती है। कुंडलिनी जागरण का आध्यात्मिकता से दूर तक लेन-देन नहीं है। इसलिये कुंडलिनी जागरण के नाम पर साधक पहले से भी अधिक अहंकारी हो जाते हैं।
इसी कारण आज तक न राम ने, न कृष्ण ने, न बुद्ध ने, न महाबीर ने, न जीसस ने, न मीरा ने, न कबीर ने, न तो कृष्णमूर्ति ने, न ओशो ने, न सांई ने कुंडलिनी शब्द की चर्चा की और न ही इसको जगाने का कभी प्रयास किया, न ही इसको रत्ती भर भी महत्व दिया, न इसकी चर्चा की। जिस तरह गीता के साथ हुआ ठीक वो ही कुंडलिनी के साथ भी हो रहा है। एक व्यक्ति के जागरण से गीता की उत्पत्ति हुई और उसके बाद सदियों से हर कोई उसकी अपने ढंग से व्याखया किये जा रहा है। गीता उनके स्वयं के जागरण की उपज नहीं है। दूसरे के जागरण और स्वाद की वह व्याखया कर रहे हैं। जागे कृष्ण, स्वाद उन्होंने चखा और बयान किया। हमने कुछ भी आज तक चखा नहीं। हम दूसरे के खाये हुये स्वाद की बड़े मजे से व्याखया कर रहे हैं उसी तरह कुंडलिनी जागरण का भी हाल है। कभी किसी ने प्रकृति के नियमों के विपरीत जाकर हठयोग की जटिल प्रक्रियाओं से कुंडलिनी को जगाया होगा और उसके जागरण के अनुभव को संचित कर व्याखया की, उसके बाद सदियों से हजारों लोगों ने प्रयास किये और आज तक करते जा रहे हैं। शायद ही किसी की अब तक जागी हो। बस गीता की तरह सब दूसरों के स्वाद का बढि या बखान किये जा रहे हैं। जागी किसी की नहीं है परंतु कुंडलिनी का ऐसा बखान कर रहे हैं कि एक बार तो सचमुच कुंडलिनी जगाया हुआ व्यक्ति भी सुनकर या पढ कर हैरान हो जाये कि लोग बगैर मीठाई खाये भी उसके स्वाद का कितना बढि या बखान कर सकते हैं। यही सब कुछ हो रहा है कुंडलिनी के साथ भी। शरीर शुद्धि और मानसिक शुद्धि से चक्र शुद्धि होती है और चक्र की शुद्धि होते ही उपर का मार्ग अवरोधरहित साफ पाकर कुंडलिनी ऊर्जा स्वतः ही ऊर्ध्वगमन करने लगती है। उसको ऊपर उठाना नहीं पड़ता। हठयोग कुंडलिनी को जर्बदस्ती ऊपर उठाने का प्रयोग है। रेकी और सहज ध्यान की प्रक्रियायें अपने आप कुंडलिनी के ऊपर उठने के कारण बन जाते हैं जो सहज है, स्वभाविक है। इसमें हानि के बजाय सिर्फ लाभ होता है और हठयोग लाभ के बजाय हानि की विक्षिप्तता की, शारीरिक, मानसिक कष्ट की ज्यादा संभावना होती है। एक आदमी जब बुद्धत्व को प्राप्त होता है तो सारे विश्व को उसकी सुगंध का तपस्या का लाभ मिलता है और हजारों के जीवन में रूपांतरण आता है। बुद्धत्य के फूल खिलते हैं। परंतु कुंडलिनी जागरण पूरी तरह एक व्यक्तिगत (पर्सनल) अनुभूति एवं उपलब्धि है जिसका एक प्रतिशत भी लाभ समाज को, विश्व को नहीं मिलता। न किसी एक के कुंडलिनी जागरण से हजारों लोग रूपांतरित हो पाते हैं हजारों तो दूर एक व्यक्ति भी किसी और के कुंडलिनी जागरण से रूपांतरित नहीं होता। भारत में, विश्वभर में सैकड़ों संत, महात्मा, गुरू, योगचार्य और साधक गण कुंडलिनी जागरण का दावा करते हैं। क्या योगदान है इनका समाज के प्रगति में, कौन सी गरीबी, भूखमरी, धर्माधतायें, भच्च्द्राचार, अनैतिकतायें जैसी बुराईयों पर इसका रत्तीभर भी प्रभाव नहीं पड़ा । इनके कुंडलिनी जागरण से एक व्यक्ति समाज का न तो समृद्ध हुआ, न दुःख से मुक्त हुआ, न स्वस्थ हुआ, न रूपांतरित हुआ। हजारों संत जगाते रहे अपनी कुंडलियां परंतु समाज का विश्व का इससे कोई हित नहीं सधने वाला। लेकिन सच्चाई तो ये है कि कुंडलिनी नहीं जागी थी तो भी संसार वहीं के वहीं था और अगर जगाने का दावा करते हैं तो भी संसार की स्थिति वहीं के वहीं है। कुंडलिनी जागरण एक सहज छलाव है जागने का भ्रम है जागती नहीं है। ३. सबसे मजेदार और हैरानी की बात तो यह है कि आज तक न मैंने और न ही बड़े संत पुरूषों ने किसी की कुंडलिनी जागरण की दावा करते हैं। उनमें एक प्रतिशत भी कोई आध्यात्मिक तेज, आनंद, या प्रभाव देखने में नहीं आया। उल्टे उनको भयानक भ्रम में उलझे देखकर बहुत दुःख हुआ और हंसी आई। क्योंकि उनके चेहरे पर अहंकार के भाव स्पष्ट थे और जो अनेक प्रकार के दृश्य मनोदर्शन ईश्वर से मिलने, उससे बात करने, उसके साथ खेलने जैसी अनेकों चर्चा करते थें। उनमें उनकी मूर्खता पर या भटकाव पर दया आ रही थी। क्योंकि ऐसे दृश्य स्वभाविक होते हैं। लेकिन ऐसे कितने ही महाआनंदायक अनुभव क्यों न हो व्यक्ति जैसे ही सामान्य होश (चेतना) में आता है उसकी आदतें प्रतिक्रियायें या स्वभाव में जरा सा भी कोई परिवर्तन देखने में नहीं आता। कुंडलिनी जागरण के नाम पर किये जाने वाले विभिन्न ध्यान के प्रयोग भी एक शराब के नशे की तरह, लत की तरह थोड ी देर तक एक दूसरी दुनिया में ले जाती है। कुंडलिनी जागरण एक हठयोग की क्रिया है जो प्रकृति के नियम के ठीक विरूद्ध कुछ करने का घातक प्रयोग है। परमात्मा ने यूँ हीं इस प्रबलतम महाशक्ति (ऊर्जा) को कामकेन्द्र के पास नहीं रखा। इसको सहस्त्रार (सिर के उपर) तक ले जाने की कामना या प्रयास, अंततया विक्षिप्तता, पागलपन, घातक शारीरिक रोग, असंतुलन जैसे दुःखों को न्योता देती है।
कुंडलिनी जगानी नहीं पड़ती बल्कि स्वयं के जागजाने से (आत्मदर्शन) वह स्वभाविक रूप से ऊपर के चक्रों में यात्रा करनी शुरू कर देती है। कुंडलिनी जागरण आत्मदर्शन, साक्षीत्व, जागरूकता का प्रतिफल है। जैसे-जैसे हम जागरूक होकर शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक अवरोधों से मुक्त होने लगते हैं (जो हम अपनी अज्ञानता के कारण शरीर के विरूद्ध जाकर पैदा करते हैं और सहज प्रकृति के नियमों के साथ जुड कर बहने लगते हैं। हमारे शुद्ध होकर, विस्तृत होकर अपने आप कुंडलिनी शक्ति को उपर उठने के लिये मज बूर कर देते हैं। कोई भी महात्मा या गुरू अगर कुंडलिनी जागरण का दावा करता है और आपकी जगाने की बात करता है वह उसी खोखले दावे की तरह भ्रम या धेखा है। जैसे कोई कहे कि वह आपको चांद पर घूमा कर ला सकता है। पहली बात तो उस गुरू की खुद की कुंडलिनी कभी नहीं जागी है और आप भी अगर उसके पीछे समय नष्ट करें तो सारा जीवन भ्रम में नष्ट हो जायेगा और जीवन का महास्वाद, महाउत्सव आप भंग कर देंगे। कुंडलिनी जागरण के नाम पर जो अनेकों अनुभव साधक बयान करते हैं वह एक सामान्य हर व्यक्ति की परामानसिक शक्तियां है जो किसी भी प्रकार के ध्यान के प्रयासों से आपकी अति शिथिल अवस्था में सतह पर आने लगती है और यही अनुभवों को आपके गुरू कुंडलिनी जागरण के अनुभव बताकर आपके अहंकार को पुष्ट कर देते हैं या आपको संतुष्ट कर देते हैं जिससे आपके लगता है कि आप सही राह पर हैं। सही गुरू के साथ है और कुछ उपलब्धिया प्राप्त कर रहे हैं। इसी घातक भ्रम में हम अपने अमूल्य जीवन को चूक जाते हैं। हम क्यों ''कुंडलिनी जागरण'' जैसे शब्दों के पीछे भागते हैं। क्योंकि इसके बारे में बढ़ा-चढ़ा कर इतना कुछ अनाप-शनाप लिख दिया गया है और चूंकि आजतक किसी भी साधक की कुंडलिनी जाग नहीं सकी ये असाध्य, रहस्यमय, कठिन तपस्या प्रतीत होती है। सहजता प्रभावित नहीं करती - जटिलता प्रभावित करती है। जिससे साधक प्रभावित होता है। यह ऐसी मृगभरी चिका है या रेगिस्तान का दिखने वाला वह जल स्रोत है जो साधक को हमेशा भ्रमाये रखता है और साधक सारा जीवन इसी इंतजार में व्यतीत कर देता है कि आज नहीं तो कल जाग ही जायेगी। कुंडलिनी जागरण पर हजारों पुस्तकें लिख दी गई सामान्य लेखकों से लेकर योगियों ने भी बहुत कुछ इसके बारे में ऐसे व्याखया की है। जैसे वह स्वयं इसके स्वाद का भोग ले चुके हैं। यह ऐसे ही परिकल्पना है जैसे कोई चाँद पर कैसे घूमकर अच्छी तरह यात्रायें करके आ सकता है। ये सभी लेखक उस मिठाई का इतना बढ़िया, इतना आकर्षक मिठाई का वर्णन करते हैं जो मिठाई सदियों से किसी ने नहीं खाई और न ही स्वयं ने कभी चखी लेकिन कुंडलिनी जागरण का बयान चसके ले ले कर करते हैं। जिससे आपके मुँह में भी पानी आ जाता है कि क्यों न मैं भी इस मिठाई को चख ही लूँ और चल पड ता है राम की तरह मृगपरीचिका को जीतने या चखने।
यह अपने आप में अजीब से विडंबना है कि जो सचमुच जीवन का अनुभव करते हैं वह पुस्तकें नहीं लिखते और जो अनुभव कभी नहीं करते वह पुस्तकें लिखते हैं क्योंकि लेखन एक कला है किसी भी विषय को आकर्षक ढंग़ से पेश करने की वह कोई भी लेखक करता है। लेखन कार्य अधिकतर शुद्धतमरूप से एक प्रोफेशनल कार्य है, व्यवसायिकता है। लेखक का काम है पुस्तकें लिखना और वह समय-समय पर विषय का चुनाव करता रहता है या प्रकाशक उसको मज बूर करते हैं ऐसे विषयों पर लिखने के लिये। लेखक सारी सूचनायें जो अब तक उपलब्ध होती है उनको यहाँ से वहाँ से एकत्रित कर उस विषय को पेश कर देता है और हम भी पुस्तकों में लिखी हर बात पर ऐसे विश्वास करते हैं जैसे बस वह अंतिम सत्य हो। लेखन कार्य हर सदी में चलता रहा है। १०० साल पहले या ५००० साल पहले कोई भी लिखा हुआ ग्रंथ हम शत-प्रतिशत आँख बंदकर सत्य मान लेते हैं और अगर संस्कृत में लिखा हुआ तो फिर श क करने की कोई गुंजाईश ही नहीं रही। हमारी मनोवैज्ञानिक दशा ऐसी हालत में है कि किसी भी पुस्तक में अगर झूठ भी संस्कृत में लिख दिया जाये तो हम पुरातन मानकर सच ही होगा समझ लेते हैं। इसलिए कुंडलिनी जागरण की पुस्तकों में संस्कृत के श्लोकों का उदाहरण और उसमें देवताओं की तस्वीरें (थोड़ी रहस्मय) हमें आसानी से प्रभावित करती हैं और हम यह मान बैठते हैं कि संस्कृत में सबूत दिये गये हैं तो सत्य ही होगा। यही खेल, भ्रम, अंधानुकरण हम सदियों से खेलते जा रहे हैं। कुंडलिनी जागरण एक नितांत अप्राकृतिक खेल है। प्रकृतिक के नियमों के विपरीत जाकर हम कौन-सा बड़ा तीर मार लेंगें। क्या करेंगें या क्या पायेंगे हम कुंडलिनी जगाकर ? अगर आपका उत्तर है हमारी परामानसिक, अलौकिक शक्तियां (जैसे अंतप्रेरणा, अंतदृष्टि, टेलीपैथी, भूत, भविष्य का अनुभव या कोई शक्तिशाली उपचार करने की क्षमता अथवा गहन समाधि की अवस्था को प्राप्त करना इत्यादि इत्यादि) का जागरण करना है तो इसके लिये कुंडली जागरण के पीछे भागने की आवश्यकता नहीं है। रेकी (उपचारात्मक स्पर्श के द्वारा प्राण ऊर्जा प्रवाहित करना) जेसी सामान्य सहज उपलब्ध विद्या नियमित प्रयोगों से भी ये उपरोक्त शक्तियां अत्यंत आसानी से प्राप्त हो सकती है। सहज ध्यान एवं मंत्र जाप के प्रयोगों से भी यह शक्तियां सक्रिय हो सकती है और निश्चित रूप से होती है।
भारत भर में सैकड़ों अध्यात्मिक (कहे जाने वाले) आश्रमों में कुंडलिनी जागरण के नाम पर साधक जुटे हुये हैं कि कोल्हु के बैल की तरह जिसमें से आज तक कुंडलिनी जागरण का तेल एक बूंद भी नहीं निकला और भविष्य में कोई संभावना भी नहीं। बगैर कुंडलिनी जागरण के अगर हमें परामानसिक शक्तियाँ प्राप्त हो सकती है। रेकी या ध्यान जैसे सहज प्रयोगों से तो क्या अर्थ है इस अप्राकृतिक खोल को खेलने का और जिन्होंने प्रयास किये उन्होंने आनंद नहीं भयंकर कष्ट भोगा है। आदमी अहंकार को प्रबल करने के लिए अनेकों प्रकार की शक्तियों की कामना करता रहा है। अगर आप कहते हैं कि कुंडलिनी जागरण से परमात्मा मिलेगा तो कृपया भ्रम से बाहर निकल जायें क्योंकि परमात्मा कुंडली जागरण के पीछे छुपकर नहीं बैठा है कि जागते ही सामने निकल आयेगा। परमात्मा तो आत्मज्ञान या जागरण होते ही चारो ओर तथा स्वयं में तुरंत दिख जाता है। पहली बात तो परमात्मा की खोज शब्द ही बेमानी है क्योंकि जो है और सिर्फ वो ही है उसकी खोज कैसी, दर्पण में चेहरे की खोज नहीं की जाती। धूल के हटते ही प्रतिबिंब झलक जाता है और सच पूछा जाये तो किसी को भी परमात्मा की खोज नहीं है और न वो कोई व्यक्ति है जो कहीं मिल जाने वाला है। आदमी की खोज परम आनंद की है। परमउत्सव की है और यह उपलब्ध होती है या तो संपूर्ण समर्पण से (जरा भी अपने को बचाकर नहीं) या जागरूकता की परम अवस्था से, जहाँ हमारी संपूर्ण प्रतिक्रियायें भागदौड़, महात्वाकांक्षायें, चाहते, चुनाव, अपेक्षायें, अहंकार की प्रतिमायें ज्ञान की अग्नि से भष्म हो जाती है और हम जीवन को अभिनय की तरह परम जागरूकता के साथ एक उत्सव, एक पूजा, एक प्रार्थना, एक कृतज्ञता, एक आनंद की तरह जी रहे होते हैं और ये अवस्था कम से कम कुंडलिनी जागरण से कभी नहीं मिलने वाली। अगर आप समझते हैं कि कुंडली जागरण अध्यात्मिकता प्रगति या अनुभव का साधन है तो फिर खयाल कर लें। कुंडलिनी जागरण केवल अहंकार का खेल है अध्यात्मिकता नहीं। क्योंकि अध्यात्मिकता का प्रतिफल है - प्रेम, नृत्य, आनंद, समभाव, समता, जागरूकता, समर्पण जिससे साधक अपने आपको बिल्कुल नहीं बचाता और कुंडलिनी जागरण में साधक अपने आपको और मजबूत कर देता है और आज तक कुंडलिनी जागरण से प्रेम, नृत्य आनंद, निरहंकारिता, समता या समर्पण जैसे कोई गुण न किसी में देखे गये और ना ही पैदा होते हैं और ये सभी पैदा नहीं हुये तो ऐसी हजारों कुंडलिनी जागकर भी कुछ भी हासिल नहीं कर पायेंगे और जीवन के परमस्वाद को कभी नहीं भोग पायेंगे और किसी भी गुरू के पीछे भागकर आपको अपने अंदर जीवन में बड़ा अच्छा विधयक या सात्विक परिवर्तन होता है तो उसका कारण गुरू नहीं आप स्वयं हैं क्योंकि जो भी शिष्य किसी भी गुरू (चाहें घटिया से घटिया गुरू हो) की खुंटी पर पूरी श्रद्धा से टंगता है या लटक जाता है तो तुम्हारी यह अटूट परम श्रद्धा ही तुम्हारे अंदर विधायक रूपांतरण लाती है। गुरू की कृपा या दृष्टि नहीं और हम समझते है कि हमारे कुंडलिनी जागरण के कारण हमारे अंदर यह परिवर्तन आया था, हमारे गुरू ने हमारी कुंडलिनी जगा दी, इसीलिये अगर गुरू में कुंडलिनी जागरण की क्षमता है और आपभी अश्रद्धा, अविश्वास के साथ जायें आप कभी भी कुछ भी अपने अंदर परिवर्तन नहीं पायेंगे। शक्ति श्रद्धा में या समर्पण में होती है, गुरू में नहीं, गुरू केवल माध्यम है, खूंटी है, मार्गदर्शक है, स्वयंमार्ग नहीं। अगर आपकी श्रद्धा अटूट प्रबल होगी तो आपकी कुंडलिनी शायद अपने आप जग जायेगी परंतु जिस गुरू की खुंटी पर आप आश्रित होकर या टंगकर अनुकरण कर रहे थे। उस गुरू की कुंडलिनी कभी नहीं खुल पाती है न उठ पाती है। इसलिये मूल मुद्दा यहां पर श्रद्धा का है इसीलिये कुंडलिनी जागरण के नाम पर किसी गुरू के पीछे न भागें। अपनी श्रद्धा को अटूट करें, मज़बूत करें और किसी पर भी टंग जायें। आप वैसे ही बहुत कुछ जगा जायेंगे। ओशो - कुंडलिनी जगदीश ! भईया, कुंडलिनी ने तुम्हारा कुछ बिगड़े ! सोई है, बेचारी को सोने दो ! काहे पीछे पड़े हो ? तुम्हें और कोई काम नहीं है ? कुंडलिनी क्यों जगाना चाहते हो ? फिर जग जाए तो फिर आकर कहोगे कि अब इसे सुलाओ ! कि अब कुंडलिनी जग गयी, अब यह चैन नहीं लेने देती। शब्द सुन लिये हैं और शब्द सुन लिये हैं तो शब्दों के साथ वासना जुड़ जाती है। कोई जैन आकर नहीं पूछता कि मेरी कुंडलिनी क्यों नहीं जग रही, क्योंकि उसके शास्त्रों में ये शब्द नहीं है। कोई बौद्ध नहीं पूछता, कोई मुसलमान नहीं पूछता, कोई ईसाई नहीं पूछता, कोई पारसी नहीं पूछता, कोई यहूदी नहीं पूछता - यहां सब मौजूद हैं - हिन्दुओं भर को यह शब्द पकड गया हैः कुडलिनी! और कुंडलिनी जगा कर रहेंगे ! और नहीं जग रही तो तुम्हें शक हो रहा है कि कोई भूल तो नहीं हो रही है ! गलती वगैरह कुछ भी नहीं हो रही है। कुंडलिनी जगााने की भी कोई जरूरत नहीं है। कुंडलिनी जगाने का भी एक शास्त्र है, लेकिन उससे गुजरना आवश्यक नहीं है। जीसस बिना उससे गुजरे पहुंच गए, बुद्ध उससे बिना गुजरे पहुंच गये, महावीर पहुंच गए। उस रास्ते से जाना आवश्यक नहीं है और उस रास्ते से जाना खतरनाक भी है, क्योंकि शरीर की प्रसुप्त शक्तियों को छेड़ना खतरे से खाली नहीं है। अच्छा तो यह है कि उन्हें बिना छेड़े गुजर जाओ। उन्हें छेड ने का सबसे बड़ा खतरा तो यह है कि हो सकता है कि तुम फिर उन पर काबू पा सको। तुम्हारे भीतर इतना बड़ा विस्फोट हो कि तुम्हारी समझ के बाहर पड जाए और समझ के बाहर पड ही जाएगा। और तुम अगर नियंत्रण न पा सको तो विक्षिप्त हो जाओगे। इसी सदी का बहुत बड़ा सदगुरू था- जार्ज गुरजिएफ। वह कुंडलिनी के बहुत खिलाफ था।
खिलाफत के कारण कुंडलिनी को उसने नया नाम ही दे दिया था- 'कुंडाबफर'। बफर लगे रहते हैं न, तुमने देखे हो ट्रेन के दो डिब्बों के बीच में जो लगे रहते हैं, उनको कहते हैं बफर। उससे कभी टक्कर वगैरह हो जाए तो डब्बे एक-दूसरे पर नहीं चढ़ जाते। वे जो बीच में बफर लगे रहते हैं, वे धक्के को पी जाते हैं। ऐसे ही कार में स्प्रिंग लगे रहते हैं, वे भी बफर हैं। वह तो गुरजिएफ उसको कहता था कुंडाबफर। शरीर की एक ऊर्जा है, जो शरीर और आत्मा के बीच बफर का काम करती है। नहीं तो शरीर के भीतर आत्मा का रहना मुश्किल हो जाए, असंभव हो जाए। उस ऊर्जा की एक पर्त तुम्हारी आत्मा को घेरे हुए है। तुम्हारी आत्मा और शरीर के बीच में उस ऊर्जा की एक पर्त है। इसलिए शरीर को लगी चोटें आत्मा तक नहीं पहुंचती। इसलिए शरीर जवान हो, बूढा हो, जीए, मरे, कोई घटना आत्मा तक नहीं पहुंचती। गुरजिएफ ने शब्द ठीक चुना था - कुंडाबफर इसको जगाने की कोई जरूरत नहीं है। इसका काम भलीभांति हो रहा है। इसे जगाकर भी स्वयं तक पहुंचा जा सकता है, लेकिन वह नाहक की झंझटें मोल लेनी है। वह ऐसे ही है जैसे कोई कान अपना उल्टे घूमकर सिर के पीछे से पकड़ने की कोशिश करे! कोई प्रयोजन नहीं है। मगर योग की बहुत-सी प्रक्रियाएं उल्टी हो गयीं। उल्टी हो गयी है, इसलिए कठिन ! कठिन अहंकार को बहुत जंचता है। सिर के बल खड़े हो तो बहुत जंचता है। जैसे कोई महान कार्य कर रहे हैं। सिर्फ बुद्धू मालूम पड ते हैं, मगर सिर के बल खड़े हैं तो महान कार्य कर रहे हैं। शीर्षासन कर रहे हैं। शरीर को इरछा-तिरछा कर रहे हैं। शरीर को ऐसा आडा-तिरछा कर रहे हैं कि कोई दूसरा न कर सके, और दूसरे न कर सके - क्योंकि इसके लिए अभ्यास चाहिए - तो आप महात्मा हो गए, महान योगी हो गए। क्योंकि कोई दूसरा इसको एकदम नहीं कर सकता, जो आप कर रहे हैं। जैसे अगर तुम्हारी कुंडलिनी जाग जाए तो तुम दूसरे के विचार पढ सकते हो। मगर अपने ही विचार काफी नहीं हैं पढ ने को ? अब दूसरे की खोपड़ी में ही काफी भरा है इससे ही तो निपट नहीं पा रहे हो, कि अब दूसरों के विचार पढोगे ! हां, थोडा -बहुत चमत्कार लोगों को दिखाने लगोगे तुम। जैसे कोई आया और उसने पूछा ही नहीं कि समय कितना है और तुमने बता दिया कि साढे नौ बजे हैं। तो वे चौकेंगे एकदम, क्योंकि पूछने आया था कि कितना बजा है।
मगर उसका सार क्या है ? पूछ ही लेने देते, क्या बिगड़ रहा था ? इसके लिए कुंडलिनी जगाई ! और कुंडलिनी जगाने में वर्षों लगेगें और यह काम तो क्षणभर में हो जाता, उसको पूछना था तो पूछ लेता। रामकृष्ण के पास एक आदमी आया, जिसकी कुंडलिनी जग गयी थी। वह बोला कि मैं पानी पर चल लेता हूं। कुंडलिनी जग जाए तो पानी पर चलने की संभावना है। क्योंकि कुंडलिनी तुम्हें पृथ्वी के गुरूत्वाकर्षण से तोड दे सकती है। मगर खतरे भी हैं उसके, क्योंकि पृथ्वी के गुरूत्वाकर्षण से टूट गए तो तुम्हारे शरीर की बहुत-सी प्रक्रियायें अस्त-व्यस्त हो जाएगी, जो कि गुरूत्वाकर्षण से बंधे होने के कारण ही व्यवस्थित है। वह आदमी पानी पर चल लेता था, उसने रामकृष्ण को आते ही चुनौती दी कि तुम बड े परमहंस लोग कहते हैं महात्मा ! अगर हो महात्मा आओ चलो गंगापर ! मैं पानी पर चल सकता हूं। रामकृष्ण ने कहा कि बहुत बढि या ! कितना समय लगा पानी पर चलना सीखने में ? उसके अकड़ से भरा हुआ था, वह अहंकार से भरा हुआ था। अहंकार को बहुत मजा आता है इस बात में कि मैं कुछ ऐसा करके दिखा दूं जो कोई दूसरा नहीं कर सकता। बिगाड ना बहुत आसान, सुधारना बहुत मुश्किल है। कुंडलिनी तुम्हें सिद्ध देगी, यह तो सिर्फ एक संभावना है ज्यादा संभावना तो यह है कि विक्षिप्तता देगी। इसलिए तुम अनेक साधू -सन्यासियों को पागल होते देखोगे। और पागल हो जाने का कारण क्या होता है ? उन्होंने, जीवन का जो सहज क्रम है, उसको तोड दिया। जो ऊर्जा किसी और काम के लिए बनी थी, उसको उन्होंने मस्तिष्क पर चढा लिया।
कुंडलिनी जगने का अर्थ होता है कि जो ऊर्जा तुम्हारे काम-केंद्र पर सोई हुई है, इसे उठा कर मस्तिष्क में चढ़ा लो। यह खतरनाक धंधा है। क्योंकि खोपड़ी में वैसे ही काफी उपद्रव मचा हुआ है। वहीं तो तुम्हारा पागलखाना है। और काम ऊर्जा को भी वहां ले जाओ! तो तुम विक्षिप्त हो सकते हो। कुंडलिनी जगाने वाले अधिक लोग विक्षिप्तता में पहुंच जाते हैं। मस्तिष्क फट पड ता है, क्योंकि ऊर्जा सम्हाले नहीं सम्हलती और ऊर्जा इस हालत में ले आती है कि फिर संगत-असंगत कुछ भी नहीं सूझता, ऊलजुलूल बकेंगें। लेकिन हमारा देश तो अद्भूत है! कोई ऊलजुलूल बके तो हम कहते हैं महात्मा सधुककड़ी भाषा बोल रहे हैं। सधुककड़ी ! अगर महात्मा गाली दे और लोगों के पीछे डंडा लेकर भागें, तो हम समझते हैं प्रसाद दे रहे हैं। गाली बकें तो समझो कि आशीष। हमारे महात्मा भी अद्भूत हैं और हम उनसे भी ज्यादा है ! हम हर चीज में से कुछ-न-कुछ निकाल लेते हैं। पागल ही हो गए लोग . . मैं ऐसे बहुत-से लोगों को जानता हूं, जो विक्षिप्त हुए हैं जो होश में नहीं है, लेकिन उनके भक्तगण समझते हैं कि वे महासमाधि में लीन है। और अगर उनकी समझ में नहीं आता वे क्या बोल रहे हैं, तो उसका कारण यह है कि वे बड़ी गहरी बातें बोल रहे हैं। वे कुछ नहीं बोल रहे ! जैसे कोई बहुत शराब पी ले और अल्ल-बल्ल बके, या कोई सन्निपात में आ जाए और ऊलजुलूल बके ! अब तुम्हारी मर्जी हो तो एकदम उसके पैर पकड लेना। कहना हक यह महाज्ञान की बातें बोल रहा है। मुझे ऐसे कई लोगों को मिलाया गया है, जो सिर्फ विक्षिप्त है, जिनको मानसिक चिकित्सा की जरूरत है। और उनकी बुनियादी भूल वही है, जगदीश, जो तुम करना चाहते हो। और एक दफा मस्तिष्क में ऊर्जा तुम्हारी सामर्थ्य के बाहर पहुंच जाए तो तुम क्या करोगे ? तुम्हारे वश के बाहर बात हो जाएगी। तुम नाचो मग्न होओ, डूबो। ऐसे डूब जाओ कि तुम्हारा अहंकार अलग न रह जाए, बस, फिर तुम्हारे भीतर कुछ घटेगा, तुम एकदम गुरूत्वाकर्षण के बाहर हो जाओगे और तुम अचानक भीतर पाओगे, ऐसा सन्नाटा छाया है, ऐसा क्वांरा सन्नाटा, जो तुमने कभी नहीं जाना था ! तुम गद्गद हो जाओगे। तुम लौटोगे जब वापिस, तुम दूसरे ही व्यक्ति हो जाओगे। स्वरूपानंद, फिर तुम्हारी मर्जी। वैसे भी स्त्री जाति को छेड़ना नहीं चाहिए और सोई स्त्री को तो बिल्कुल छेड ना ही मत ! अब कुंडलिनी बाई सोई है, तुम काहे पीछे पड़े हो ! तुम्हें और कोई काम नहीं ! और जगा कर भी क्या करना है ? खुद जागो कि कुंडलिनी को जगाना है ! ये भी खुद को जगाने से बचाने के उपाय है। कोई कहेगा कि हमें चक्र जगाने हैं। जगा लो, घनचक्कर हो जाओगे ! किसी को कुंडलिनी जगानी है, किसी को रिद्धि-सिद्धि पानी है। करोगे क्या ? हाथ से राख निकालने लगोगे तो कुछ हो जाएगा दुनिया में ! मदारीगिरी में मत पड़े । खुद को जगाओ, चैतन्य को जगाओ, बोध को जगाओ, जागरूक बनो, यह तो समझ में आता है, मगर कुंडलिनी को जगाना है ! न तम्हें पता है कि कुंडलिनी क्या है, न तुम्हें पता है कि उसका प्रयोजन क्या है, और चूंकि कुछ भी उसके बाबत पता नहीं है, इसलिए उसके संबंध में कुछ भी मूर्खतापूर्ण बातें चलती रहती है। कुंडलिनी कुछ भी नहीं है सिवाय तुम्हारी काम-ऊर्जा के, तुम्हारे सेक्स-एनर्जी के। और सेक्स-एनर्जी का, काम ऊर्जा का जो स्वभाविक केंद्र है, वह जननेद्रिंय है। उसे वहीं रहने दो। उसे ऊपर वगैरह चढाने की कोई आवश्यकता नहीं है। उसको ऊपर चढ़ाओगे, विक्षिप्त हो जाओगे। फिर मस्तिष्क फटेगा। मेरे पास लोग आते हैं कि सिर फटा जा रहा है। कोई कहता है कान में जैसे बैंडबाजे बजते रहते हैं चौबीस घंटे। या बादलों की गड गडगडाहट सुनायी पड ती है। अब कुछ करिए। मैं उनको कहता हूँ भईया, तुम जाओ किसी के पास, जिससे कुंडलिनी जगवायी हो उससे सुलाने की तरकीब। प्रत्येक केंद्र की ऊर्जा उसी केंद्र पर होनी चाहिए किसी केंद्र पर ले जाने की कोई आवश्यकता नहीं क्योंकि जब भी कोई ऊर्जा एक केन्द्र से दूसरे केन्द्र पर जाएगी तो तुम्हारे जीवन का जो सहज क्रम है, उसमें व्याघात पड़ेगा । परमात्मा ने प्रत्येक चीज को वहां रखा है जहां होनी चाहिए। पंडित गोपीनाथ इस समय कुंडलिनी के संबंध में सबसे बड़े पंडित हैं। और उनका कहना है, कुंडलिनी जागने से मनुष्य में एकदम प्रतिभा का आविर्भाव होता है। उनकी जाग गयी, वे कहते हैं। मगर प्रतिभा का कोई आविर्भाव दिखाई पड ता नहीं, उनमें ही नहीं दिखाई पड ता। कुछ आविष्कार करो ! कुछ नयी खोज करो ! कुछ विज्ञान को दान दो ! कुछ इस देश की दीनता को मिटाने के लिए, दरिद्रता को मिटाने के लिए कोई दृष्टि दो ! वह इनकी कुंडलिनी जागने से कुछ नहीं होता। और इनकी जग गयी, इसका प्रमाण ? बस ये कहते हैं। न कोई आध्यात्मिकता गंध मालूम होती है, न कोई जीवन में प्रशांति मालूम होती है, न कोई आनंद-उल्लास मालूम होता है, न कोई नृत्य है, न कोई बांसुरी बज रही है, कोई उत्सव की कहीं खबर नहीं मिलती। वही हेडक्लर्क के हेडक्लर्क। और इस जगाने के नाम पर क्या-क्या उपद्रव चल रहा है, जिसका हिसाब लगाना मुश्किल है। लोगों को उल्टे-सीधे आसन सिखाए जाते हैं, शरीर को मोड़ो तोड़ो ! और लोग बेचारे करते हैं सब तरह की कवायतें, इस आशा में कुंडलिनी जगेगी। और जिनकी जग गयी, जरा उनकी तरफ तो देखो जग कर हुआ क्या ? इनके जीवन से क्रोध गया ? इनके जीवन से मोह गया ? इनके जीवन से कामवासना गयी ? इनके जीवन से आसक्ति गयी ? इनके जीवन से अहंकार गया ? कुछ भी नहीं गया। बल्कि और बढ़ गया। कुंडलिनी जो जग गयी तो अब अहंकार और भी ऊंची पताका पर चढ गया। वह और ऊंचा झंडा फहरा रहा है। स्वयं जागो ! इन उपद्रवों में मत पड़े ! इन व्यर्थ की बकवासों में मत उलझो। और मैं यह नहीं कहता हूं कि ऊर्जा नहीं है, ऊर्जा है, मगर उसको सिर तक ले जाने की कोई जरूरत नहीं है। सिर के पास अपन ऊर्जा है, उतनी ही काफी है, वही तुम्हें काफी परेशान किए हुए है। और नयी ऊर्जा सिर में ले जाओगे! इतनी ही गैस काफी है तुम्हारे सिर में। ज्यादा गैस हो जाएगी, दिक्कत में पड़ोगे । इतने से ही सिर ठीक चल रहा है। ठीक ही क्या चल रहा है, जरूरत से ज्यादा चल रहा है। चौबीस घंटे चल ही रहा है। जन्म से लेकर मरने तक चलता है। अगर कभी बंद भी होता है तो बस तभी जब तुम्हें मंच पर बोलने को खड़ा कर दिया जाए। बस, तब एक क्षण को सकते में आ जाते हो और खोपड़ी बंद हो जाती है। एकदम स्टार्ट ही नहीं होती ! और अगर तुम काम-ऊर्जा को मस्तिष्क तक ले भी गए, तो भी तुम इतने सोये हुए हो, इतने ही सोये हुए रहोगे। काम-ऊर्जा मस्तिष्क में पहुंच जाएगी तो न-मालूम किस-किस तरह की कल्पनाएं करेगी। ये तुम्हारी योगियों की कथाएं, महात्माओं की कथाएं इसी तरह की कल्पनाओं से भरी है। तुम जो कल्पना करोगे, वहीं कल्पना तुम्हें दिखायी पड ने लगेगी। काम-ऊर्जा की वही खूबी है कि वह हर कल्पना को साकारकर देती है।
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